अध्याय - 9

विधान

विधान बनाने के लिए आरंभिक कार्यवाही करने के संबंध में विभाग की जिम्मेदारी

9.1संसद में विधान बनाने से संबंधित प्रत्येक प्रस्ताव पर आरंभिक कार्यवाही ऐसे विभाग द्वारा की जाएगी जिसका विधान से संबंध होगा।

विधान की मसौदा पूर्व अवस्था

9.2किसी विधायी प्रस्ताव का मसौदा तैयार करने से पूर्व मोटे तौर पर निम्नलिखित चार उप-अवस्थाओं से गुजरना होगा:-

विधायी प्रस्तावों का प्रतिपादन

(क) संबंधित विभाग सभी संबंधित व्यक्तियों और प्राधिकारियों से आवश्यक रूप से प्रशासनिक और वित्तीय दृष्टि से परामर्श कर विधायी प्रस्तावों को तैयार करेगा। इसमें प्रस्तावित विधान बनाने की आवश्यकता और उस विधान में सम्मिलित किए जाने वाले सभी महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा किया जाना शामिल होगा लेकिन मसौदों के तकनीकी ब्यौरे इसमें नहीं दिए जाएंगे।

विधि और न्याय मंत्रालय से परामर्श

(ख) इसके बाद संबंधित विभाग मामले को कानूनी और संवैधानिक दृष्टि से इसकी व्यवहार्यता के संबंध में सलाह के लिए विधि और न्याय मंत्रालय को भेजेगा। इस अवस्था में, विधि और न्याय मंत्रालय विस्तार में जाए बिना, वर्तमान कानूनों और प्रस्तावों की संवैधानिक विधि मान्यता को ध्यान में रखते हुए इस प्रकार के विधान की आवश्यकता अथवा वांछनीयता पर सामान्यत: परामर्श करेगा।

मंत्रिमंडल का अनुमोदन

(ग) यदि विधान पर आगे कार्यवाही करने का निर्णय लिया जाता है तो संबंधित विभाग विधि और न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) तथा अन्य संबंधित विभागों से परामर्श कर एक स्वत: पूर्ण नोट मंत्रिमंडल के विचार के लिए तैयार करेगा।

(घ) संबंधित विभाग विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) को कार्यालय ळ्ाापन के साथ सभी संगत कागजात उन आधारों का उल्लेख करते हुए भेजेगा जिन पर विधान बनाने का निर्णय लिया गया है जिससे कि विभाग उस विधेयक का मसौदा तैयार करने का कार्य आरंभ कर सके। इस कार्यालय ळ्ाापन में:

(i)विधायी प्रस्तावों के पूर्ण विवरण होंगे;

(ii)संपूर्ण आधारिक सामग्री (संदर्भ के लिए फाइल में रखी हुई) होगी;

(iii)प्रस्तावित विधेयक से संबंधित अन्य सभी ब्यौरे; तथा

(iv)मंत्रिमंडल के लिए प्रारूप टिप्पणी।

प्रशासनिक विभाग विधेयक का मसौदा तैयार नहीं करेगा।

मसौदा तैयार करने की अवस्था

9.3इसके बाद, विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) विधिक कार्य विभाग से स्वीकृति मिलने के बाद प्रस्ताव की प्राप्ति की तारीख से तीस दिनों के भीतर सामान्यत: विधेयक का प्रारूप तैयार करेगा बशर्ते कि किसी स्पष्टीकरण की जरूरत न हो या आकस्मिकताओं, जैसे प्रारूपकार का बजट प्रस्तावों आदि को तैयार करने में व्यस्त रहना, के कारण ऐसा करना संभव न हो। संबंधित विभाग द्वारा उपलब्ध कराई गई सामग्री के आधार पर विधेयक के विभिन्न पहलुओं के स्पष्टीकरण के लिए, जब कभी आवश्यक हो, उस विभाग के अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श किया जाएगा।

विधेयक का फारमेट

9.4 विधेयक का फारमेट निम्न प्रकार का होगा:-

(क) यदि प्रारंभिक खंडों सहित विधेयक में 25 से अधिक खंड हों तो खंडों के विन्यास को दर्शाने वाली तालिका सारणी; और

(ख) संशोधनकारी विधेयक के मामले में, जिसमें मूल अधिनियम के उपबंधों के संगत सार वाली विधि में संशोधन किया जाना हो।

मंत्रिमंडल का अनुमोदन

9.5 विधि एवं न्याय मंत्रालय तथा अन्य संबंधित विभाग के साथ विचार-विमर्श करके एक बार नोट को अंतिम रूप दिए जाने तथा संबंधित विभाग द्वारा संवीक्षा कर लिए जाने के बाद विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) द्वारा तैयार किए गए विधेयक के मसौदे को स्वीकार किए जाने पर विभाग नोट को मंत्रिमंडल के विचार तथा अनुमोदन के लिए मंत्रिमंडल सचिवालय को भेजेगा।

मंत्रिमंडल को भेजे जाने वाले नोट में:

(क) विधायी प्रस्तावों का उल्लेख किया जाएगा जिनमें प्रस्तावित विधि-निर्माण की स्पष्ट रूप से आवश्यकता, क्षेत्र तथा उद्देश्य को दर्शाया जाएगा;

(ख) उसमें अन्य संबंधित विभागों के विचारों को सम्मिलित किया जाएगा तथा यदि मंत्रिमंडल सचिवालय द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आवश्यक हो तो विभागों को दिखाया जाएगा;

(ग) प्रस्तावित विधि-निर्माण के सभी निहितार्थों को स्पष्ट करना; तथा

(घ) परिशिष्ट-II के अनुसार प्रस्तावित विधेयक का मसौदा तैयार करना

मंत्रिमंडल के निर्णय के बाद की जाने वाली कार्रवाई

9.6 मंत्रिमंडल का अनुमोदन प्राप्त करने के बाद, संबंधित विभाग यह देखने के लिए मंत्रिमंडल के निर्णय की जांच करेगा कि क्या मंत्रिमंडल को प्रस्तुत किए गए विधेयक के मसौदे में कोई परिवर्तन आवश्यक है। यदि आवश्यक हो तो मंत्रिमंडल के निर्णयों के साथ सभी संगत कागजातों को विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) को भेजा जाएगा जिससे कि मंत्रालय मंत्रिमंडल के निर्णयों के अनुसार संबंधित विभाग के साथ विचार-विमर्श कर विधेयक के मसौदे में आवश्यक परिवर्तन कर सके। तथापि, यदि मंत्रिमंडल के अनुमोदन के बाद विधेयक में कोई संशोधन आवश्यक न हो तो संबंधित विभाग निम्नलिखित तैयार करेगा:

प्रक्रिया 7.1 लोक सभा नियम 65 राज्य सभा नियम 62

(क) विधेयक से संबंधित उद्देश्यों और कारणों का विवरण तैयार करेगा जिस पर मंत्री के हस्ताक्षर होंगे;

खंडों से संबंधित टिप्पणियां

(ख) यदि विधेयक जटिल प्रकार का हो तो उद्देश्यों और कारणों के कथन के साथ संलग्न करने के लिए खंडों से संबंधित टिप्पणियां तैयार करेगा;

वित्तीय ळ्ाापन प्रक्रिया 7.2, 7.3

लोक सभा नियम 69

राज्य सभा नियम 64

(ग) व्यय संबंधी विधेयकों के संबंध में वित्त मंत्रालय के साथ विचार-विमर्श कर वित्तीय ळ्ाापन तैयार करेगा, इसमें विशेष रूप से उन खंडों की ओर ध्यान दिलाया जाएगा जिनमें व्यय व्यवस्था की गई हो और इसमें आवर्ती तथा अनावर्ती खर्च का अनुमान भी दिया जाएगा; तथा

प्रत्यायोजित विधान संबंधी ळ्ाापन

प्रक्रिया 8.4 लोक सभा नियम 70 राज्य सभा नियम 65

(घ) प्रत्यायोजित विधान संबंधी ळ्ाापन तैयार करेगा जिसमें प्रस्तावों के क्षेत्र को स्पष्ट किया जाएगा और यह बताया जाएगा कि उनका स्वरूप सामान्य है या असामान्य।

उपर्युक्त सभी दस्तावेजों को अंतिम रूप दिए जाने से पहले, विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) को भी दिखाया जाएगा।

राष्ट्रपति की सिफारिश/

पूर्व मंजूरी प्राप्त करना

प्रक्रिया 8.10

9.7.1पैरा 9.6 के अनुसार कार्रवाई करने के बाद संबंधित विभाग निम्नलिखित प्राप्त करेगा:-

प्रक्रिया 8.21 से 8.25

(क) किसी विधेयक की पुर:स्थापना के लिए राष्ट्रपति की सिफारिश:

(i)जिसका उद्देश्य नए राज्य बनाना अथवा वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करना (संविधान का अनुच्छेद 3); या

(ii)जिसका उद्देश्य संविधान के अनुच्छेद 117(1) के अनुसरण में संविधान के अनुच्छेद 110 की धारा (1) की उपधारा (क) से (च) तक में निर्दिष्ट मामलों में से किसी एक की व्यवस्था करना हो; या

(iii)कोई ऐसा कर या शुल्क लगाना अथवा उसमें परिवर्तन करना जिसमें राज्यों की रूचि हो (संविधान का अनुच्छेद 274); या

(ख) किसी ऐसे विधेयक को पुर:स्थापित करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 348(1) में उल्लिखित किसी प्रयोजन के लिए उपयोग की जाने वाली भाषा के लिए व्यवस्था करनी हो; तथा

प्रक्रिया 8.22

(ग) यदि इसमें भारत की संचित निधि से व्यय करना सम्मिलित हो तो विधेयक पर विचार करने के लिए राष्ट्रपति की सिफारिश (संविधान का अनुच्छेद 117(3) टिप्पणी:उपर्युक्त (ग) में उल्लिखित सिफारिश प्रत्येक सदन के संबंध में अलग से प्राप्त की जाएगी।

9.7.2राष्ट्रपति की सिफारिश अथवा पूर्व स्वीकृति प्राप्त करने के लिए विभाग मंत्री के माध्यम से राष्ट्रपति को एक स्वत: पूर्ण टिप्पणी प्रस्तुत करेगा जिसके साथ मंत्रिमंडल को प्रस्तुत की गई टिप्पणी की एक प्रति तथा उसके निर्णय और विधेयक की एक प्रति संलग्न होगी।

प्रक्रिया 8.23

9.7.3इसके बाद, विभाग राष्ट्रपति की सिफारिश/पूर्व मंजूरी को अनुबंध-7 में दिए गए फार्म में महासचिव, लोक सभा/राज्य सभा को भेजेगा।

9.7.4कार्यविधिक अथवा संवैधानिक स्वरूप को आपत्तियां न हों इसके लिए विभाग अनुबंध-8 में दिए गए फार्म में मंत्री को सूचना प्रस्तुत करेगा।

संसदीय कार्य मंत्रालय को सूचित करना

9.8किसी सत्र के दौरान पुर:स्थापित किए जाने वाले प्रस्तावित विधेयक (विधेयकों) के विषय में विस्तृत विवरण अनुबंध-1 में दिए गए फार्म के भाग-1 में सत्र प्रारंभ होने से कम से कम एक महीना पूर्व संसदीय कार्य मंत्रालय को भेज दिया जाएगा जिससे कि वह मंत्रालय उस सत्र का कार्यक्रम तैयार कर सके।

सदन जिसमें विधेयक को पुर:स्थापित किया जाएगा

9.9ऐसे विधेयक जो कि संविधान के अनुच्छेद 110(1) तथा 117(1) के साथ पठित अनुच्छेद 109 के उपबंधों से संबंधित हैं, लोक सभा में पुर:स्थापित किए जाएंगे। अन्य विधेयकों के मामले में संसदीय कार्य मंत्रालय से विचार विमर्श कर इस बात का निर्णय किया जाएगा कि उन्हें किस सदन में पुर:स्थापित किया जाएगा।

विधेयकों का मुद्रण

9.10.1विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) अंतिम रूप दिया गया विधेयक इसकी प्रूफ प्रति प्राप्त करने के लिए भारत सरकार के मुद्रणालय को भेजेगा।

प्रक्रिया 8.12

9.10.2विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग):-

(क) विधेयक के अंग्रेजी तथा हिन्दी अनुवाद की दो प्रूफ प्रतियां एक साथ निम्नलिखित को भेजेगा:

(i)उस सदन के सचिवालय को भेजेगा जिसमें उसे (उपर्युक्त पैरा 9.9 देखें) पुर: स्थापित करने का निर्णय लिया गया है; तथा

(ii)संसदीय कार्य मंत्रालय को भेजेगा; तथा

(ख) फाइल संबंधित विभाग को लौटा देगा।

9.10.3लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय मुद्रित विधेयक की स्वच्छ प्रति प्राप्त करके उसे प्रशासकीय विभाग तथा विधायी विभाग को उसकी यथार्थता की संवीक्षा करने के लिए भेजता है। विधेयक की संवीक्षा करने के बाद प्रशासकीय विभाग उसे उसी दिन विधायी विभाग को लौटा देता है जिससे कि विधायी विभाग संशोधनों/सुळाावों, यदि कोई हो, को उसमें सम्मिलित कर सके तथा अंतिम रूप से जांच की गई प्रति को लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय को भेज सके।

9.10.4लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय मुद्रित विधेयक की स्वच्छ प्रतियां प्राप्त करके उन्हें सदस्यों के बीच परिचालित करता है।

प्रक्रिया 8.20

9.10.5विधेयकों की अतिरिक्त प्रतियां चाहने वाले विभागों को अपनी मांग फार्म एस 99 में भरकर लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय को इस प्रकार भेजनी चाहिए जिससे कि यह मांग उस सचिवालय के पास प्रूफ की प्रति भेजे जाने से पहले पहंुच जाए।

प्रक्रिया 8.28

9.10.6विधेयकों पर प्रवर समिति/संयुक्त समिति/स्थायी समिति की रिपोर्टों की अतिरिक्त प्रतियां प्राप्त करने के लिए भी इसी प्रकार की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। अत: इस प्रकार की मांग रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने की तारीख से पर्याप्त समय पूर्व भेज दी जानी चाहिए।

सदन में विधेयक को पुर:स्थापित करने की प्रक्रिया

9.11.1संबंधित विभाग अनुबंध 9 में दिए गए फार्म में विधेयक की पुर:स्थापना के लिए लोक सभा/राज्य सभा के महासचिव को प्रस्ताव की सूचना भेजेगा।

9.11.2लोक सभा अध्यक्ष के निदेशों के अधीन:

अध्यक्षीय निदेश 19क प्रक्रिया 8.14

(क) लोक सभा में सरकारी विधेयक को पुर:स्थापित करने के लिए सामान्यत: सात दिन के नोटिस की आवश्यकता होती है; तथा

अध्यक्षीय निदेश 19ख प्रक्रिया 8.13

(ख) कोई भी विधेयक पुर:स्थापना के लिए लोक सभा में तब तक प्रस्तुत नहीं किया जाएगा जब तक कि विधेयक को पुर:स्थापित किए जाने के प्रस्तावित दिन से कम से कम दो दिन पहले उसकी प्रतियां सदस्यों को उपलब्ध न करा दी गई हों।

9.11.3जहां 19क निदेश में छूट अपेक्षित हो, वहां मंत्री विस्तार से कारण बताते हुए विधेयक की पुर:स्थापना के लिए इस निदेश की आवश्यकता को हटाने का अध्यक्ष से अनुरोध करेगा। तथापि, जहां 19ख निदेश में छूट अपेक्षित हो, वहां मंत्री इस संबंध में अध्यक्ष से अनुरोध करते समय उन्हें इस बात की भी सूचना देगा कि उसने लोक सभा में विभिन्न पार्टियों के नेताओं से विचार-विमर्श किया है तथा उन्हें विधेयक की पुर:स्थापना के लिए निदेश में छूट देने में कोई आपत्ति नहीं है। संबंधित विभाग सदस्यों में परिचालित किए जाने के लिए लोक सभा सचिवालय को मंत्री द्वारा विधिवत् प्रमाणित प्रत्येक भाषा में एक प्रति सहित अनुबंध-10 में दिए गए फार्म मंे ळ्ाापन की अंग्रेजी में 500 प्रतियां तथा हिन्दी में 300 प्रतियां भेजेगा।

9.11.4संसदीय कार्य मंत्रालय द्वारा निर्धारित तारीख को लोक सभा/राज्य सभा में पुर:स्थापना में विधेयक को प्रस्तुत किया जाता है तथा इसके बाद लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय द्वारा उसे भारत के राजपत्र में प्रकाशित कराया जाता है।

पुर:स्थापना के पहले प्रकाशन प्रक्रिया 8.7 लोक सभा नियम 64 राज्य सभा नियम 61

9.11.5मंत्री के अनुरोध पर, अध्यक्ष/सभापति विधेयक को पुर:स्थापना से पहले उसे लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय द्वारा राजपत्र में प्रकाशित कराए जाने की अनुमति दे सकता है। ऐसे मामलों में, सदन की अनुमति लिए बिना ही विधेयक पुर:स्थापित कर लिया जाएगा। तथापि, यदि औपचारिक रूप से पुर:स्थापित किए जाने से पहले इसमें परिवर्तन किया जाता है तो उप-पैरा 9.11.1 में दी गई प्रक्रिया का पालन किया जाएगा।

लो.स.नि. 331 रा.स.नि. 270

9.11.6विभागीय संसदीय स्थायी समितियां ऐसे विधेयकों की जांच करती हैं तथा उन पर रिपोर्ट तैयार करती हैं जो सभापति, राज्य सभा अथवा अध्यक्ष, लोक सभा, यथास्थिति, द्वारा इन समितियों को भेजे जाते हैं। सामान्यत: विनियोग विधेयकों, वित्त विधेयकों, अध्यादेशों के प्रतिस्थापक विधेयकों तथा सतही किस्म के विधेयकों के अतिरिक्त, विधेयकों को ही संबंधित स्थायी समितियों (अनुबंध 23ख) को उनकी जांच तथा रिपोर्ट के लिए भेजा जाता है। स्थायी समितियां विधेयकों पर अपनी रिपोर्ट उत्तरवर्ती संसद सत्र में प्रस्तुत करती हैं और कभी-कभी तो रिपोर्ट प्रस्तुत करने में और अधिक समय ले लेती हैं। तथापि जब कभी विधान बनाने की अत्यावश्यकता हो तो, संबंधित मंत्री, इसके कारणों का उल्लेख करते हुए, जिस सदन में विधेयक पुर:स्थापित किया गया है, उस सदन के पीठासीन अधिकारी को विधेयक को स्थायी समिति को न भेजने का अनुरोध कर सकता है, ताकि चालू संसद सत्र के दौरान विधेयक पर विचार किया जा सके तथा सदनों द्वारा पारित किया जा सके।

9.11.7स्थायी समिति को जांच के लिए भेजे गए विधेयकों के मामले में, संबंधित विभाग समिति की रिपोर्ट की जांच, रिपोर्ट के सदनों अथवा पीठासीन अधिकारियों को प्रस्तुत किए जाने पर कर सकता है। यदि विभाग, अपने मंत्री के अनुमोदन से, समिति की सिफारिशों के आधार पर सदन में पुर:स्थापित किए गए रूप में विधेयक के प्रावधानों, में परिवर्तन करने का निर्णय लेता है तो उसे विधेयक में प्रस्तावित संशोधन करने के लिए मंत्रिमंडल का अनुमोदन प्राप्त करना होगा। मंत्रिमंडल के अनुमोदन के बाद, मंत्री द्वारा सदन में लाए जाने वाले संशोधनों के प्रस्ताव के नोटिस को विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) से परामर्श करने के बाद अंतिम रूप दिया जाएगा। इस प्रकार तैयार किया गया संशोधनों के प्रस्ताव का नोटिस, विधेयक पर विचार करने तथा पारित करने के मंत्री द्वारा विधिवत् हस्ताक्षरित नोटिस सहित संबंधित सदन के महासचिव को, संसदीय कार्य मंत्रालय को इसकी सूचना देते हुए, भेजा जाना चाहिए।

पुर:स्थापन के बादप्रस्ताव

लोक सभा नियम 74 राज्य सभा नियम 69

9.12विधेयक के पुर:स्थापित किए जाने के बाद, मंत्री अनुबंध-11, 12, 13, 14 तक दिए गए उपयुक्त फार्म मंे महासचिव, लोक सभा/राज्य सभा को निम्न प्रस्तावों में से कोई एक प्रस्ताव रखने के अपने आशय की सूचना भेज सकता है:

(क) इस पर विचार किया जाए और उसे पारित किया जाए; अथवा

(ख) इसे सदन की प्रवर समिति को सौंप दिया जाए; अथवा

(ग) इसे दूसरे सदन की सहमति से दोनों सदनों की संयुक्त समिति को सौंप दिया जाए (पैरा 9.7.1(क) (ii) में निर्दिष्ट विधेयक को छोड़कर); अथवा

(घ) इसे जनता की राय जानने के लिए परिचालित किया जाए।

विधेयक की वापसी लोक सभा नियम 110 राज्य सभा नियम 118 अध्यक्षीय निदेश 36 प्रक्रिया 8.33

9.13यदि किसी अवस्था में विधेयक को वापस लेना आवश्यक हो जाता है तो ऐसा करने के लिए विधि एवं न्याय मंत्रालय तथा संसदीय कार्य मंत्रालय से परामर्श किया जाएगा और मंत्रिमंडल की स्वीकृति प्राप्त की जाएगी तथापि, जिन मामलों में समयाभाव के कारण मंत्रिमंडल का पूर्व अनुमोदन लेना संभव न हो, उनमें प्रभारी मंत्री के साथ परामर्श कर निर्णय लिया जाएगा। इसके पश्चात, यथासंभव शीघ्र ही एक टिप्पणी सामान्य रूप से मंत्रिमंडल के कार्योत्तर अनुमोदन के लिए प्रस्तुत की जाएगी। विधेयक को वापस लेने का स्वरूप दो बातों पर निर्भर करता है, यथा, विधेयक किस अवस्था में है और क्या इसे एक सदन द्वारा पारित कर दिया गया है, और दूसरे सदन में विचाराधीन है। इस प्रयोजन से अनुबंध -15 और 16 में दिए गए फार्म, जो भी उपयुक्त हो, उपयोग में लाए जाएंगे। विधेयक को वापस लेने के कारण बताने वाला एक विवरण भी जिस तारीख को विधेयक को वापस लेने का प्रस्ताव किया जाना है, उससे कम से कम 48 घंटे पहले लोक सभा/राज्य सभा को भेज दिया जाएगा। परिचालन के लिए लोक सभा सचिवालय में भेजी जाने वाली प्रतियों की संख्या अंग्रेजी में 650 और हिन्दी में 350 तथा राज्य सभा में भेजी जाने वाली प्रतियों की संख्या पैरा 4.1 के अनुसार होगी।

प्रवर/संयुक्त समिति का गठन

9.14.1प्रवर/संयुक्त समिति के सदस्यों की संख्या, जिस तारीख तक यह समिति अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी, का निदेश संबंधित विभाग द्वारा दिया जाएगा और समिति में नियुक्त किए जाने वाले सदस्यों के नाम संसदीय कार्य मंत्रालय द्वारा सुळााए जाएंगे। ये विवरण अनुबंध-12 अथवा 13 में दिए गए फार्म में बताए प्रस्ताव में समाविष्ट किए जाएंगे। यदि विधेयक को एक सदन द्वारा प्रस्ताव को पारित कर लिए जाने पर संयुक्त समिति को सौंपे जाने का विचार हो तो मंत्री अनुबंध-17 में दिए गए फार्म में एक सहमति प्रस्ताव दूसरे सदन में रखेगा।

लोक सभा नियम 299

राज्य सभा नियम 76

9.14.2समिति का गठन होने के बाद, इसके चेयरमैन को अध्यक्ष/सभापति द्वारा नामित किया जाता है। प्रवर/संयुक्त समिति की बैठक से संबंधित सभी मामलों पर लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय द्वारा कार्रवाई की जाएगी। भले ही मंत्री समिति का सदस्य न हो लेकिन वह अध्यक्ष की अनुमति से समिति में वक्तव्य दे सकता है।

प्रवर/संयुक्त समिति के समक्ष विचाराधीन विधेयकों में संशोधन प्रक्रिया 8.26

9.14.3प्रवर/संयुक्त समिति को सौंपे गए विधेयकों में संशोधन करने के लिए सरकार का सभी सूचनाओं का मसौदा विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) द्वारा तैयार किया जाएगा। इन संशोधनों की सूचनाएं उस मंत्री द्वारा, जो समिति का सदस्य है, लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय को अनुबंध-18 में दिए गए फार्म में उस दिन की बैठक के कम से कम एक दिन पहले दी जाएंगी जिस दिन बैठक में संशोधनों को रखा जाना है।

जनमत जानने के लिए

परिचालित किए जाने

वाले विधेयक संबंधी प्रक्रिया अध्यक्षीय निदेश 20-23

9.15जब कोई विधेयक जनता की राय जानने के लिए परिचालित किया जाए तो उस स्थिति में लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय आवश्यक कार्रवाई करेगा जो इस संबंध में राज्य सरकारों को भी लिखेगा।

प्रवर/संयुक्त समिति को रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने के बाद की प्रक्रिया लोक सभा नियम 77

राज्य सभा नियम 93

9.16प्रवर/संयुक्त समिति की रिपोर्ट सदन में प्रस्तुत किए जाने के बाद, प्रभारी मंत्री प्रवर/संयुक्त समिति द्वारा भेजे गए विधेयक को रखने के लिए अपने आशय की सूचना दे सकता है कि:-

(क) इस पर विचार लिया जाए और इसे पारित किया जाए; अथवा

(ख) इसे उसी समिति या अन्य समिति को पुन: सौंप दिया जाए; अथवा

(ग) जनता की और राय जानने के लिए पुन: परिचालित किया जाए।

9.17जब यह प्रस्ताव पारित हो जाए तो:-

(क) विधेयक पर विचार किया जाए; अथवा

(ख) प्रवर/संयुक्त समिति द्वारा दी गई रिपोर्ट के अनुसार विधेयक पर विचार किया जाए, विधेयक पर खण्डश: विचार किया जाएगा। उस स्थिति में सदस्य विधेयक में संशोधन प्रस्तुत कर सकते हैं।

संशोधन

9.18.1सदस्यों द्वारा संशोधनों के लिए दी गई सूचनाओं की प्रतियां लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय संबंधित विभागों को भेज देता है। इनके प्राप्त होने पर शाखा अधिकारी उनके विषय में सरकार का रूख निश्चित करने के लिए उनको मंत्री के प्रयोग के लिए सार के साथ प्रस्तुत करेगा।

9.18.2इसी अवस्था में सरकारी संशोधन भी प्रस्तुत किए जाएंगे। इन संशोधनों का मसौदा विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) तैयार करेगा और इसके लिए अनुबंध-19 में दिए गए फार्म का प्रयोग किया जाएगा।

9.18.3संविधान के अनुच्छेद 117(1) और 274 के अंतर्गत किए जाने वाले संशोधनों के संबंध में राष्ट्रपति की सिफारिश अथवा पूर्व स्वीकृति प्राप्त करने पर भी वही शर्तें लागू होंगी जो उन्हीं अनुच्छेदों के अंतर्गत आने वाले विधेयकों पर लागू होती हैं (इसके लिए पैरा 9.7.1 देखें) लेकिन उपर्युक्त शर्तें अनुच्छेद 117(1) के अंतर्गत आने वाले संशोधनों के मामलों में लागू नहीं होंगी जिनमें किसी कर में कमी अथवा कर अपवंचन की व्यवस्था हो।

मंत्रिमंडल सचिवालय का तारीख 1-11-72 का कार्यालय ळ्ाापन संख्या 11/1/4/72-सी.एफ

9.18.4यदि समय हो तो किसी विधेयक के उपबंधों में संशोधन करने के प्रस्ताव अनुमोदन के लिए मंत्रिमंडल को प्रस्तुत किए जाएंगे परंतु यदि समयाभाव के कारण ऐसा करना संभव न हो तो प्रभारी मंत्री, प्रधानमंत्री के साथ परामर्श कर निर्णय लेगा। इसके बाद, यथासंभव शीघ्र मंत्रिमंडल के कार्याेत्तर अनुमोदन के लिए सामान्य रूप में एक टिप्पणी प्रस्तुत की जाएगी।

विधि एवं न्याय मंत्रालय द्वारा संवीक्षा प्रक्रिया 8.29 अध्यक्षीय निदेश 34

9.19सदन द्वारा विधेयक को पारित किए जाने के बाद:-

(क) विधेयक जिस रूप में पारित किया गया है, उसकी एक प्रति लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय, विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) को भेजी जाती है जिससे वह प्रत्यक्ष त्रुटियों में सुधार कर सके और सदन द्वारा स्वीकृत संशोधनों के फलस्वरूप अन्य परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए उनकी संवीक्षा कर सके; तथा

(ख) विधेयक को सहमति के लिए दूसरे सदन में भेजने से पहले उसमें वे परिवर्तन कर लिए जाते हैं जो अध्यक्ष/सभापति ने स्वीकार किए हों।

दूसरे सदन में विधेयक पर विचार करना लोक सभा नियम 115 राज्य सभा नियम 122

9.20.1विधेयक को दूसरे सदन के पटल पर रखे जाने के बाद संबंधित मंत्री अनुबंध-20 में दिए गए फार्म में सदन के महासचिव को प्रस्ताव की सूचना देगा और आवश्यक होने पर राष्ट्रपति की सिफारिश से भी अवगत कराएगा।

वित्तीय ळ्ाापन तथा प्रत्या-योजित विधान संबंधी ळ्ाापन

में तद्-नुसार परिवर्तन

प्रक्रिया 8.2-8.5

9.20.2यदि कोई विधेयक किसी एक सदन ने संशोधनों के साथ पारित किया गया हो तो इस मामले में संबंधित विभाग इस बात का निर्णय लेगा कि क्या वित्तीय ळ्ाापन और/अथवा प्रत्यायोजित विधान के ळ्ाापन में तदनुसार परिवर्तन करना आवश्यक है या नहीं। यदि परिवर्तन करना आवश्यक समळाा जाए तो इसमें प्रभारी मंत्री, विधेयक का हस्ताक्षर किया हुआ एक पत्र अनुबंध 21 में दिए गए फार्म में महासचिव, लोक सभा/राज्य सभा को, जिसे संशोधित ळ्ाापन अग्रेषित किया गया हो, भेजा जाएगा। यह संशोधित ळ्ाापन यथास्थिति वित्त मंत्रालय/विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) से परामर्श कर तैयार किया जाएगा।

विधि एवं न्याय मंत्रालय द्वारा आगे संवीक्षा और राष्ट्रपति की सहमति

9.21दोनों सदनों द्वारा विधेयक को पारित किए जाने के बाद:-

(क) लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय द्वारा एक प्रति पैराग्राफ 9.19 मंे उल्लेख किए गए अनुसार संवीक्षा करने और प्रत्यक्ष त्रुटियों को ठीक करने के लिए विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) को भेजी जाती है;

अध्यक्षीय निदेश 34

(ख) विधेयक के विधि एवं न्याय मंत्रालय से वापस किए जाने के बाद लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय इसे पुन: मुद्रित कराएगा। इसके ऊपर च्जैसाकि संसद के सदनों द्वारा पारित किया गया अंकित किया जाएगा।

लोक सभा नियम 128

राज्य सभा नियम 135

(ग) लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय, विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) के माध्यम से राष्ट्रपति के सचिव को विधेयक की दो प्रतियां तथा पांच अतिरिक्त प्रतियां भेजेगा;

प्रक्रिया 8.32

(घ) जिन मामलों में राष्ट्रपति की सहमति किसी तारीख विशेष तक लेनी आवश्यक हो, उनमें संबंधित विभाग द्वारा काफी पहले लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय, विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) और संसदीय कार्य मंत्रालय को सूचित किया जाएगा। इस प्रयोजन से विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) राष्ट्रपति के सचिवालय से संपर्क बनाए रखेगा; और

(ङ) विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) राष्ट्रपति की सहमति की तारीख, जो वह तारीख है, जिसमें विधेयक अधिनियम बन जाता है, संबंधित विभाग तथा संसदीय कार्य मंत्रालय को बताता है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर युक्त एक प्रति विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) में रख ली जाती है और दूसरी प्रति लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय को वापस कर दी जाती है। राष्ट्रपति सचिवालय में एक अतिरिक्त प्रति रखी जाती है।

सरकारी राजपत्र में प्रकाशन

9.22विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग):

(क) अधिनियम को भारत के असाधारण राजपत्र में प्रकाशित कराएगा;

(ख) अधिनियम की प्रतियां सभी राज्य सरकारों को अपने सरकारी राजपत्रों में प्रकाशन के लिए भेजेगा; तथा

बिक्री के लिए अधिनियम की प्रतियां मुद्रित कराना

(ग) जन साधारण में बिक्री के लिए उपयुक्त रूप से अधिनियम की प्रतियां मुद्रित कराएगा।

गैर-सरकारी सदस्य के विधेयक से संबंधित प्रक्रिया

9.23.1जब कभी संसद का कोई गैर-सरकारी सदस्य किसी विधेयक को पुर:स्थापित करने की अनुमति के प्रस्ताव की सूचना देता है तो लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय विधेयक की एक प्रति के साथ इस सूचना की एक प्रति संबंधित विभाग को भेजेगा।

9.23.2संबंधित विभाग इस प्रकार का विधेयक अनियमित करने की संसद की क्षमता के बारे में विधि एवं न्याय मंत्रालय से परामर्श करेगा।

9.23.3विधेयक के संबंध में सरकार की नीति का निर्णय संबंधित विभाग सरकारी स्तर पर संसदीय कार्य संबंधी मंत्रिमंडलीय समिति के अनुमोदन से करेगा। इस संबंध में यथोचित परिवर्तन के साथ पैरा 5.8.3 और 5.8.4 के उपबंध लागू होंगे।

9.23.4गैर सरकारी सदस्यों के विधेयकों की पुर:स्थापना पर विचार करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 117 के खंड (1) और/अथवा (3) के अधीन राष्ट्रपति की अपेक्षित सिफारिश सामान्यत: दी जाएगी, बशर्ते कि अत्यन्त असाधारण परिस्थितियों में राष्ट्रपति की सिफारिश रोक देना आवश्यक न हो जाए। यदि कोई विभाग यह महसूस करे कि किसी विधेयक पर राष्ट्रपति की सिफारिश नहीं दी जानी चाहिए तो वह इस प्रकार के प्रस्ताव से संबंधित परिस्थितियों का स्पष्ट उल्लेख करते हुए उस सार की पांच प्रतियां संसदीय कार्य मंत्रालय को भेजेगा जो अनुमोदन के लिए उन्हें संसदीय कार्य की मंत्रिमंडल समिति को भेज देगा।

अध्यादेश

9.24.1विधेयकों के संबंध में लागू प्रक्रिया यथोचित परिवर्तन के साथ संविधान के अनुच्छेद 123(1) के अधीन अध्यादेशों के प्रख्यापन पर भी लागू होगी।

9.24.2किसी अध्यादेश के मसौदे की शर्तें संबंधित विभाग से परामर्श कर तय किए जाने के बाद, विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) अध्यादेश की एक प्रति संबंधित विभाग के मंत्री और प्रधान मंत्री के माध्यम से राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए प्रस्तुत करेगा जिसके साथ-

(क) अध्यादेश की एक अतिरिक्त प्रति;

(ख) मंत्रिमंडल के लिए नोट की एक प्रति; तथा

(ग) अध्यादेश से संबंधित मंत्रिमंडल के निर्णय की एक प्रति संलग्न होगी।

9.24.3संबंधित प्रशासकीय विभाग अध्यादेश राष्ट्रपति सचिवालय भेजे जाने की तारीख और समय की सूचना विधायी विभाग को देगा।

9.24.4विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग):

(क) अध्यादेश को भारत के असाधारण राजपत्र में प्रकाशित कराएगा;

(ख) संबंधित विभाग और संसदीय कार्य मंत्रालय को अध्यादेश के प्रख्यापन के संबंध में सूचना देगा; तथा

(ग) अध्यादेश की प्रतियां सभी राज्य सरकारों को अपने राजपत्रों में प्रकाशन के लिए भेजेगा।

अध्यादेश के प्रख्यापन के बाद की कार्रवाई

9.25अध्यादेश के प्रख्यापित होने पर निम्नलिखित कार्रवाई की जाएगी:

(क) विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) अध्यादेश की हिन्दी और अंग्रेजी अनुवाद की पचहत्तर-पचहत्तर प्रतियां सभा पटल पर रखे जाने के लिए संसदीय कार्य मंत्रालय को भेजेगा।

(ख) संबंधित विभाग संसदीय कार्य मंत्रालय को सूचित करेगा कि क्या अध्यादेश को संसद के अधिनियम द्वारा पुर:स्थापित करने का प्रस्ताव है।

(ग) यदि यह निर्णय लिया जाता है कि अध्यादेश के स्थान पर संसद में अधिनियम बनाया जाए तो संबंधित विभाग इस संबंध में एक विधेयक यथासंभव सत्र के प्रारंभ होने के दिन पुर:स्थापित करने के लिए तैयार रखेगा।

लोक सभा नियम 71

राज्य सभा नियम 66

(घ) संबंधित विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) से परामर्श करके, एक ऐसा विवरण तैयार करने के संबंध में कार्यवाही करेगा जिसमें उन परिस्थितियों का स्पष्ट उल्लेख किया जाएगा जिनके कारण अध्यादेश द्वारा विधान बनाना आवश्यक हो गया था। यह विवरण अध्यादेश के स्थान पर विधेयक के पुर:स्थापना के समय सदन के पटल पर रखा जाएगा। यह विवरण सदस्यों में भी परिचालित किया जाएगा। इस विवरण की प्रतियां उतनी ही होंगी जैसा कि पैरा 4.1 (ग) में बताया गया है।

लोक सभा नियम 71

राज्य सभा नियम 66

(ड.) यदि कोई ऐसा अध्यादेश प्रख्यापित किया जाए जिसमें किसी ऐसे विधेयक के उपबंध पूर्णत: या अंशत: अथवा संशोधन सहित समाविष्ट हों जो सदन में अनिर्णीत पड़ा हो तो संबंधित विभाग अध्यादेश को प्रख्यापित करने के बाद सत्र के आरम्भ में प्रत्येक सदन के पटल पर विधि और न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) के साथ परामर्श करके तैयार किया गया एक विवरण रखेगा। इसमें उन परिस्थितियों को स्पष्ट किया जाएगा जिनके कारण अध्यादेश द्वारा तुरंत विधान बनाना आवश्यक हो गया था।

संघ राज्य क्षेत्रों के संबंध में विधान बनाना

9.26.1संविधान के अनुच्छेद 246(4) के द्वारा संसद को संविधान की पहली अनुसूची में वर्णित संघ राज्य क्षेत्रों से संबंधित किसी भी मामले में विधान बनाने की शक्तियां प्राप्त हैं।

9.26.2विभिन्न संघ राज्य क्षेत्रों में से

(क) पांडिचेरी की विधान सभा है जो कि संघ राज्य क्षेत्र अधिनियम, 1963 के तहत गठित की गई थी और जिसे सूची II (राज्य सूची) और सूची III (समवर्ती सूची) में विनिर्दिष्ट मामलों के संबंध में विधान बनाने की शक्तियां प्राप्त हैं, जहां तक ऐसा कोई मामला संघ राज्य क्षेत्रों के संबंध में लागू होता है;

(ख) संघ राज्य क्षेत्र अंडमान और निकोबार द्वीप समूहों, चंडीगढ़, दमन और दीव, दादरा और नागर हवेली में गृह मंत्रालय द्वारा सलाहकार समिति गठित की गई हैं।

(ग) राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की विधान सभा है जिसका गठन राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अधिनियम, 1991 के साथ गठित भारत के संविधान के अनुच्छेद 239कक के तहत किया गया था और जिसे सूची II (राज्य सूची) अथवा सूची III (समवर्ती सूची) में विनिर्दिष्ट मामलों के संबंध में विधान बनाने की शक्तियां प्राप्त हैं जहां तक ऐसा कोई मामला संघ राज्य क्षेत्रों पर लागू होता हो। लेकिन राज्य सूची की प्रविष्टियों 1, 2 और 18 तथा इस सूची की प्रविष्टि 64, 65 और 66 है। जहां तक उक्त प्रविष्टियों 1, 2 और 18 से संबंधित मामलों में यह शक्तियां प्राप्त नहीं हैं।

संघ राज्य क्षेत्रों के लिए संसदीय विधान

9.27.1संघ राज्य क्षेत्रों के लिए संसदीय विधान बनाने के प्रस्तावों का कार्य संबंधित विभाग द्वारा किया जाएगा जो कि इस संबंध में:-

(क) गृह मंत्रालय से प्रस्तावित विधान बनाने की वांछनीय और उससे संबंधित सिद्धांतों के साथ-साथ उसके अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण उपबंधों के सार के संबंध में परामर्श करेगा; और

(ख) संवैधानिक और कानूनी दृष्टि से विधि और न्याय मंत्रालय (विधि कार्य विभाग) से परामर्श करेगा।

9.27.2उसके बाद संबंधित विभाग:

(क) विधान के विषय के किसी भी पहलू से संबंधित मामले पर संबंधित विभाग से परामर्श करेगा;

(ख) विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए मामले को विधि एवं न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) को भेज देगा;

(ग) यदि मामला सूची II (राज्य सूची) अथवा सूची III (समवर्ती सूची) में विनिर्दिष्ट मामलों से संबंधित है तो विधेयक को संबंधित सलाहकार समिति के विचार प्राप्त करने के लिए गृह मंत्रालय को भेज देगा बशर्ते कि इसका संबंध ऐसी समिति वाले किसी संघ राज्य क्षेत्र से हो।

9.27.3उसके बाद संबंधित विभाग मंत्रिमंडल का अनुमोदन प्राप्त करने के लिए कार्यवाही करेगा और इस अध्याय में केन्द्र में विधान बनाने के लिए पहले ही वर्णित प्रक्रिया के अनुसार प्रस्तावित विधान को संसद में पुर:स्थापित करेगा।

विधान सभाओं द्वारा विधान बनाना

9.28.1संघ राज्य क्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 की धारा 3 में संघ राज्य क्षेत्र पांडिचेरी में विधान सभा बनाने का उपबंध है। उक्त संघ राज्य क्षेत्र पांडिचेरी के कार्य संचालन संबंधी नियमों में ऐसा उपबंध है कि प्रशासक ऐसे प्रत्येक विधेयक को केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुमति प्राप्त करने के लिए भेजेगा, जो/जिसे:

(क) विधान सभा द्वारा पारित किए जाने पर उक्त अधिनियम की धारा 21 या धारा 25 के तहत राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखा जाना आवश्यक हो;

(ख) सूची III (समवर्ती सूची) में उल्लिखित किसी मामले से संबंधित हो;

(ग) संविधान के अनुच्छेद 304 के उपबंध, उसी तरह लागू होंगे जिस रूप में वे संघ राज्य क्षेत्र पर लागू होते हैं;

(घ) किसी भी ऐसे मामले से संबंधित हो जिसमें अंतत: संघ राज्य क्षेत्र की संचित निधि से किए जाने वाले मूल खर्च या राजस्व को छोड़ने या कर की दर में कमी करने के कारण केन्द्रीय सरकार से अतिरिक्त आर्थिक सहायता लेने की आवश्यकता पड़े;

(ड़) विश्‍वविद्यालयों के किसी मामले से संबंधित हो; और

(च) किसी अल्पसंख्यक वर्ग, अनुसूचित जातियों अथवा अनुसूचित जनजातियों के हितों को प्रभावित करता हो या प्रभावित होने की संभावना हो।

9.28.2इस प्रकार के विधेयकों के लिए पूर्व अनुमोदन प्राप्त करने से संबंधित पत्रादि पर:

(क) उपर्युक्त पैरा 9.28.1 के भाग (ग) के मामलों को छोड़कर गृह मंत्रालय में कार्रवाई की जाएगी; और

(ख) पैरा 9.28.1 के मामले में गृह मंत्रालय से परामर्श करके वाणिज्य विभाग में कार्रवाई की जाएगी। सभी मामलों में इस पत्र आदि पर अन्य संबंधित विभागों तथा विधि और न्याय मंत्रालय से विचार- विमर्श करके कार्रवाई की जाएगी।

9.29.1राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार अधिनियम, 1991 की धारा 3 में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में विधान सभा बनाने का उपबंध है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के कार्य संचालन संबंधी नियमों में ऐसा उपबंध है कि राज्यपाल ऐसे प्रत्येक विधेयक को केन्द्र सरकार के पास भेजेगा जो:-

(क) विधान सभा द्वारा पारित कर दिए जाने पर यथास्थिति अनुच्छेद 239 के खंड (3) के उपखंड (ग) के परंतुक के तहत या उक्त अधिनियम की धारा 24 के दूसरे परंतुक के तहत राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखा जाना आवश्यक हो;

(ख) संविधान के अनुच्छेद 286, 287, 288 और 304 के उपबंध, इस पर उसी तरह लागू होंगे जिस रूप में वे राजधानी पर लागू होते हैं; और

(ग) किसी भी ऐसे मामले से संबंधित हो जिसमें अंतत: संघ राज्य क्षेत्र की संचित निधि से किए जाने वाले मूल खर्च या राजस्व छोड़ने या कर की दर में कमी करने के कारण केन्द्र सरकार से अतिरिक्त आर्थिक सहायता की आवश्यकता पड़े।

9.29.2केन्द्र सरकार समय-समय पर जारी किसी अनुदेश के अध्यधीन उप राज्यपाल निम्नलिखित मामलों के संबंध में गृह मंत्रालय में केन्द्र सरकार को या गृह मंत्रालय को उसकी प्रतिलिपि भेजते हुए उपयुक्त मंत्रालय को पिछला संदर्भ देगा:-

(i) किसी राज्य सरकार, भारत के उच्चतम न्यायालय या किसी अन्य उच्च न्यायालय से केन्द्र सरकार के संबंधों को प्रभावित करने वाले प्रस्ताव;

(ii) मुख्य सचिव या पुलिस आयुक्त, सचिव (गृह) और सचिव (लैंड्स) की नियुक्ति से संबंधित प्रस्ताव;

(iii) ऐसे महत्वपूर्ण मामले जिनसे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की शांति और अमन प्रभावित होता हो या प्रभावित होने की संभावना हो; और

(iv) ऐसे मामले जिनसे किसी अल्पसंख्यक समुदाय, अनुसूचित जाति या पिछड़े वर्ग के हित प्रभावित होते हों या प्रभावित होने की संभावना हो।

9.29.3इस प्रकार के विधेयकों के लिए पूर्व अनुमोदन से संबंधित पत्रादि पर:-

(क) उपर्युक्त पैरा 9.29.1 की मद (ग) के मामले को छोड़कर गृह मंत्रालय में कार्रवाई की जाएगी; तथा

(ख) पैरा 9.29.1 की मद (ग) के मामले में गृह मंत्रालय से परामर्श करके वाणिज्य विभाग में कार्रवाई की जाएगी।

सभी मामलों में इन पत्रादि पर अन्य संबंधित विभागों तथा विधि और न्याय मंत्रालय से परामर्श करके कार्रवाई की जाएगी।

9.30संघ राज्य क्षेत्र पांडिचेरी और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की विधान सभा द्वारा पारित तथा प्रशासक द्वारा राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित विधेयकों से संबंधित सभी पत्रादि पर गृह मंत्रालय में कार्रवाई की जाएगी जो कि विधि और न्याय मंत्रालय तथा अन्य संबंधित विभागों से परामर्श करके ऐसे विधेयकों को राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत करेगा।

अध्यादेश

9.31प्रत्येक ऐसे मामले में जिसमें (i) संघ राज्य क्षेत्र पांडिचेरी के प्रशासक और (ii) राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के उप राज्यपाल को अध्यादेश प्रख्यापित करने का अधिकार प्राप्त है [पंाडिचेरी के मामले में संविधान का अनुच्छेद 239ख और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के मामले में अनुच्छेद 239ख के साथ पठित अनुच्छेद 239क(8)], राष्ट्रपति के पूर्व अनुदेश प्राप्त करने आवश्यक हैं विधेयकों के संबंध में ऐसे पूर्व अनुदेश प्राप्त करने के लिए आवश्यक परिवर्तनों सहित उपर्युक्त पैरा 9.28 और 9.29 में वर्णित प्रक्रिया लागू होगी।

अधिनियमों का विस्तार

9.32संघ राज्य क्षेत्रों से संबंधित अधिनियमों की सुसंगत धारा के उपबंधों** के तहत केन्द्र सरकार किसी राज्य में लागू अधिनियमों का विस्तार अधिसूचना द्वारा (क) चंडीगढ़ (ख) दादरा और नागर हवेली (ग) दिल्ली (घ) दमन और दीव तथा (ङ) पांडिचेरी संघ राज्य क्षेत्रों में करने के लिए सक्षम है। अधिनियमों के ऐसे विस्तार से संबंधित सभी मामलों पर गृह मंत्रालय में कार्रवाई की जाएगी जो कि विधि और न्याय मंत्रालय, अन्य संबंधित विभागों और यदि आवश्यक समळाा गया तो संबंधित संघ राज्य क्षेत्र के प्रशासन से परामर्श करके ऐसे प्रस्तावों की जांच करेगा।

विनियम

9.33.1संविधान के अनुच्छेद 240 द्वारा राष्ट्रपति को (क) अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (ख) दादरा और नागर हवेली (ग) दमन और दीव (घ) लक्ष्यद्वीप, और (ङ) पांडिचेरी संघ राज्य क्षेत्रों में शांति, प्रगति और अच्छा सुशासन बनाए रखने के लिए विनियम बनाने का अधिकार प्राप्त है। तथापि, संघ राज्य क्षेत्र पांडिचेरी के मामले में यह अधिकार पांडिचेरी की विधान सभा के भंग हो जाने या इसका कार्य रोक दिए जाने पर ही मिलता है।

9.33.2गृह मंत्रालय विनियम के विषय से प्रशासनिक रूप से संबंधित मंत्रालयों से परामर्श करके विनियमों के प्रख्यापन संबंधी प्रस्तावों पर कार्रवाई करेगा। विनियम पर मंत्रिमंडल का अनुमोदन प्राप्त होने पर इसे विधायी विभाग द्वारा अंतिम रूप दिया जाएगा और इसे गृह मंत्रालय के माध्यम से राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।

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