अध्याय - 11

अधीनस्थ विधि निर्माण

परिचय

11.1.1भारत का संविधान और संसद द्वारा बनाए गए कानून सरकार को मूल विधान के लक्ष्यों की पूर्ति के लिए, लेकिन उनके उपबंधों के अंतर्गत रहते हुए नियमों, विनियमों, उप-नियमों आदि को बनाने और उन्हें भारत के राजपत्र में अधिसूचित करने की शक्तियां प्रदान करते हैं। चूंकि ये नियम आदि सांविधिक प्रकार के होते हैं अत: इन्हें च्अधीनस्थ विधि निर्माण कहा जाता है।

11.1.2संबंधित विभाग नियम आदि बनाकर उनको विधि और न्याय मंत्रालय को भेजेगा जो संवैधानिक, कानूनी और प्रारूपण की दृष्टि से उनकी जांच करेगा।

11.1.3विभाग को अधीनस्थ विधि-निर्माण संबंधी मामलों को विधि और न्याय मंत्रालय को भेजने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि नीचे दी गई जांच सूची में उल्लिखित बातों को पूरा कर लिया गया है ताकि मामलों का निपटारा तत्परता से हो सके और अनावश्यक पत्राचार से बचा जा सके।

जांच सूची

(i)मूल नियमों, विनियमों, आदेशों आदि के संबंध में:

(क) जिन प्राधिकरणों से परामर्श करना अपेक्षित है, प्रशासकीय विभाग ने उनसे परामर्श कर लिया है;

(ख) जहां नियमों आदि को पूर्व-व्यापी प्रभाव दिया जाना हो (उन मामलों मंें जहां मूल अधिनियम अथवा संविधान पूर्व व्यापी प्रभाव देने को प्राधिकृत करता हो) वहां टिप्पण के रूप में एक व्याख्यात्मक ळ्ाापन जोड़ा गया हो जिसमें यह स्पष्ट किया गया हो कि इस प्रकार के पूर्व व्यापी प्रभाव से किसी भी व्यक्ति के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा;

(ग) जहां वर्तमान नियमों आदि का अधिक्रमण अथवा निरसन करना हो तो इस प्रकार के नियमों की अद्यतन प्रतियां संदर्भ के लिए फाइल में रखी जाएं;

(घ) इस प्रकार के प्रस्ताव का अनुमोदन करने के लिए सक्षम प्राधिकारियों का अनुमोदन ले लिया गया है।

(ii)नियम, विनियम, आदेश आदि के आशोधन के संबंध में:-

(क) मूल नियमों की अद्यतन प्रतियां अथवा ऐसे नियमों की प्रतियां, बाद के संशोधन की प्रतियों सहित, फाइल में संदर्भ के लिए रख दी गई हैं;

(ख) पाद टिप्पणी जिसमें मूल नियम और बाद के सभी संशोधनकारी नियमों के राजपत्र संदर्भ दिए हों, प्रारूप के साथ लगाए जाएं;

(ग) इस प्रकार के प्रस्ताव का अनुमोदन करने के लिए सक्षम प्राधिकारियों का अनुमोदन ले लिया गया है;

(घ) जहां नियमों आदि को पूर्व-व्यापी प्रभाव दिया जाना हो (उन मामलों में जहां मूल अधिनियम अथवा संविधान पूर्व-व्यापी प्रभाव देने को प्राधिकृत करता हो) वहां एक टिप्पण के रूप में व्याख्यात्मक ळ्ाापन जोड़ा गया हो जिसमें यह स्पष्ट किया गया हो कि इस प्रकार के पूर्व-व्यापी प्रभाव से किसी भी व्यक्ति के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा; तथा

(ङ) जिन प्राधिकारियों से परामर्श करना हो उनसे परामर्श कर लिया गया है।

(iii)उन नियमों आदि के संबंध में जिनको पहले सामान्य सूचना के लिए प्रकाशित करने के बाद अब अंतिम रूप से प्रकाशित करना है, प्रारूप की उद्देशिका में निम्नलिखित तथ्य होने चाहिएं:-

(क) अधिसूचना की संख्या जिससे प्रारूप प्रकाशित किया गया हो तथा राजपत्र जिसमें प्रारूप नियम प्रकाशित किए गए, की तारीख;

(ख) वह तारीख जिसको प्रारूप नियमों वाले राजपत्र की प्रतियां जनता को उपलब्ध कराई गई;

(ग) जनता से टिप्पणियां प्राप्त करने के लिए निर्धारित अंतिम तारीख;

(घ) विभाग को भेजे गए सभी संदर्भ, प्रस्ताव को स्पष्ट करने वाले एक स्वत: पूर्ण टिप्पण के साथ भेजे जाने चाहिए; तथा

(ड.) समयबद्ध मामलों में प्रशासकीय विभाग को इसका फाइल में विशिष्ट रूप से उल्लेख करना चाहिए। ऐसे मामलों को यथासंभव एक उपयुक्त स्तर के अधिकरी द्वारा संबंधित विधायी सलाहकारों के साथ चर्चा के बाद निपटाया जाए।

जहां नियमों आदि का पूर्व प्रकाशन आवश्यक हो वहां अपनाई जाने वाली प्रक्रिया

11.2यदि किसी अधिनियम के अनुसार उसके अधीन बनाए गए नियमों आदि का पूर्व-प्रकाशन आवश्यक हो तो संबंधित विभाग:-

(क) विधि तथा न्याय मंत्रालय से परामर्श करके नियमों का प्रारूप तैयार करेगा;

(ख) 30 दिन की निर्धारित अवधि के भीतर आपत्तियां और सुळााव मांग कर उनको राजपत्र में प्रकाशित करवा देगा;

(ग) यदि सुळााव उन संबंधित व्यक्तियों से प्राप्त किए जाने हों जिन पर विधान का प्रभाव पड़ सकता हो तो उनको यथाशीघ्र रजिस्ट्री पत्र भेजकर उनसे उनके विचार मांगे जाने चाहिए। और, यदि आवश्यक हो तो, प्रारूप नियमों को राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय समाचार पत्रों में प्रकाशित करके, यह कार्य किया जाना चाहिए;

(घ) निर्धारित 30 दिन की अवधि बीत जाने पर जिसकी गणना राजपत्र के जनता में बिक्री के लिए उपलब्ध कराए जाने की तारीख से की जाएगी, संबंधित विभाग प्राप्त आपत्तियों और सुळाावों पर विचार करेगा;

(ड.) यदि प्राप्त सुळााव/आपत्तियां बड़ी संख्या में हों तो अंतिम नियमों को टिप्पणी प्राप्त करने की अंतिम तारीख से छ: मास की अवधि के भीतर अधिसूचित कर दिया जाना चाहिए। यदि कोई भी आपत्ति/सुळााव प्राप्त नहीं होता है अथवा इस प्रकार प्राप्त आपत्तियों आदि की संख्या भी बहुत कम हो तो, नियमों को अंतिम रूप में तीन मास की अवधि के भीतर अधिसूचित कर दिया जाना चाहिए; और

(च) यदि आशोधन किए जाने हों तो विधि तथा न्याय मंत्रालय से परामर्श करके इन नियमों को अंतिम रूप दे देगा।

नियम बनाने की समय-सीमा मंत्रि मंडल सचिवालय के तारीख 25.8. 71 के कार्यालय ळ्ाापन संख्या 6/1/13/71-सी.एफ.

11.3.1संबंधित कानून के लागू होने की तारीख से 6 मास की अवधि के अन्दर सांविधिक नियम, विनियम और उप-नियम बना लिए जाएंगे। जिन मामलों में किन्हीं भी कारणों से, ऐसा करना संभव न हो तो, उनको यथाशीघ्र प्रथम सचिव और मंत्री के ध्यान में लाया जाएगा।

11.3.2जिन मामलों में विभाग छ: मास की निर्धारित अवधि के भीतर नियम नहीं बना पाए, ऐसे मामलों में उनको अधीनस्थ विधान संबंधी समिति से समय बढ़ाने के लिए निवेदन करना चाहिए। ऐसे निवेदनों में समय बढ़ाने के लिए कारण दिए गए हों और ऐसा समय बढ़ाने के लिए निवेदन एक बार में तीन मास से अधिक की अवधि का नहीं होना चाहिए। ऐसे निवेदन मंत्री महोदय का अनुमोदन प्राप्त करने के पश्चात् ही किये जाने चाहिए।

नियमों आदि को राजपत्र में अधिसूचित करना

11.4नियमों आदि को अंतिम रूप दे दिए जाने के बाद, विभाग उन्हें राजपत्र में प्रकाशित करवाने और यदि अधिनियम के तहत आवश्यक हो तो उन्हें प्रत्येक सदन के पटल पर रखवाने के संबंध में कार्रवाई करेगा। इस संबंध में अपनाई जाने वाली कार्यविधि पैरा 11.5 में बताई गई है।

नियमों आदि को प्रत्येक सदन के पटल पर रखना

11.5.1प्रकाशन के बाद, नियमों आदि को यथासंभव शीघ्र सभा पटल पर रखा जाएगा और, किसी भी अवस्था में 15 दिन (राष्ट्रपति शासन के अधीन राज्य से संबंधित अधिसूचनाओं के मामले में 30 दिन) के भीतर ऐसा किया जाएगा और इस अवधि की गणना:

प्रक्रिया 6.15

(क) यदि सदन का सत्र चल रहा हो तो सरकारी राजपत्र में उनके प्रकाशित किए जाने की तारीख से; अथवा

प्रक्रिया 6.15

(ख) यदि सदन का सत्र नहीं चल रहा हो तो, अगले सत्र के प्रारंभ होने की तारीख से की जाएगी।

प्रक्रिया 6.1(ग)

11.5.2नियमों आदि की एक अधिप्रमाणित प्रति सदन के पटल पर रखे जाने के लिए निम्नलिखित सूचना के साथ लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय को भेजी जाएगी।

(क) संक्षिप्त अभिप्राय;

(ख) उस अधिनियम का नाम तथा उस धारा की संख्या जिसके तहत कागज रखा जाना है;

(ग) अधिसूचना की च्सामान्य सांविधिक नियम अथवा च्सांविधिक आदेश संख्या और राजपत्र के किस भाग तथा खंड में प्रकाशित हुई उसकी संख्या;

(घ) राजपत्र में प्रकाशित किए जाने की तारीख;

(ड.) सदन के पटल पर रखे जाने की प्रस्तावित तारीख;

(च) क्या अधिनियम के तहत नियम आदि सदन द्वारा संशोधित किए जाने हैं;

(छ) जिस अवधि के लिए उन्हें सदन पटल पर रखा जाना आवश्यक है; तथा

(ज) देरी के कारण, बशर्ते कि उन्हें सदन के पटल पर रखे जाने में अनावश्यक देरी हो गई है।

11.5.3यदि नियमों आदि को प्रेस से छपवाने में देरी होने की संभावना हो तो विहित समय सीमा के भीतर, साइक्लोस्ट्ाइल की हुई/फोटो प्रतियां ही सदन के पटल पर रखी जाएंगी।

11.5.4अधीनस्थ विधान संबंधी सामग्री के छपने में होने वाली देरी से बचने के लिए विभागों को यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि निम्नलिखित औपचारिकताएं सभी पहलुओं से पूरी कर ली गई हैं:-

(i) विभाग को नियमों आदि से संबंधित अधिसूचना किसी विशेष तारीख तक साप्ताहिक/असाधारण राजपत्र में प्रकाशित करने हेतु भेजने के साथ-साथ उन्हें प्रेस के प्रबंधक को संबोधित एक अर्ध-शासकीय पत्र भी भेजना चाहिए जिसमें असाधारण राजपत्र अथवा साप्ताहिक राजपत्र में प्रकाशित किए जाने की तारीख का स्पष्ट रूप से उल्लेख हो।

(ii) अधिकांश नियमों की सूचनाओं के प्रकाशन के लिए प्रेस को यथासंभव उचित समय दिया जाना चाहिए।

(iii) विभाग द्वारा अपेक्षित अतिरिक्त प्रतियों की संख्या अर्ध-शासकीय पत्र तथा मुद्रण मांगपत्र में स्पष्ट रूप से दर्ज की जाए।

(iv) राजपत्र के मुद्रण एवं वितरण से संबंधित मुद्रण निदेशालय के संशोधित अनुदेशों, जो उनके तारीख 2-9-1985 के कार्यालय ळ्ाापन संख्या 17034/1/87-पी (III) द्वारा जारी किए गए हैं, के अनुसार मुद्रणालय में मंगलवार को 13.00 बजे तक प्राप्त सभी अधिसूचनाएं उसी सप्ताह के शनिवार के राजपत्र में प्रकाशित की जाएंगी।

11.5.5ऐसे नियम जिस अवधि तक प्रत्येक सदन पटल पर रखे रहने चाहिए उस अवधि को अधिनियम द्वारा विहित किया जाता है। इस बात का निर्धारण करने के लिए कि उनके द्वारा भेजे गए कागज वस्तुत: सदन के पटल पर किन तारीखों को रखे गए थे बुलेटिल का भाग-I देखा जाएगा। यदि इन नियमों आदि का हिन्दी और अंग्रेजी रूपांतर अलग-अलग तारीखों को सदन के पटल पर रखा गया हो तो नियम आदि को सदन के पटल पर रखे रहने की अवधि की गणना, दोनों तारीखों के बाद वाली तारीख से की जाएगी।

नियमों आदि को पुन: सदन के पटल पर रखना प्रक्रिया 6.11, 6.12 लोक सभा नियम 234

11.6.1प्रत्येक सत्रावसान के बाद, विभाग प्रत्येक सदन के पटल पर रखे गए नियमों आदि की यह देखने के लिए जांच करेगा कि जिस विहित अवधि तक के लिए वे सदन के पटल पर रखे जाने थे, वह पूरी हो गई है या नहीं। यदि नहीं तो इन नियमों आदि को सदन के पटल पर पुन: प्रस्तुत करने की तारीख से कम से कम पूरे तीन दिन पहले इनके पुन: प्रस्तुत करने की तारीख (जो कि यथासंभव आगामी सत्र में विभाग के लिए नियत पहला दिना होना चाहिए) बताते हुए इसकी सूचना लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय को भेज देनी चाहिए। जिस मंत्री ने इन नियमों को पहले सदन के पटल पर रखा है, यदि वह बदल नहीं गया हो तो इन नियमों आदि के सदन के पटल पर पुन: रखे जाने के समय उनके साथ अधिप्रमाणित अथवा अतिरिक्त प्रतियां भेजना आवश्यक नहीं है।

प्रक्रिया 6.13

11.6.2यदि निर्धारित अवधि के पूर्ण होने से पहले ही लोक सभा भंग हो जाती है तो संबंधित नियम आदि नई लोक सभा में उसकी पूर्ण निर्धारित अवधि तक के लिए नए सिरे से सदन के पटल पर रखे जाएंगे।

सदन के पटल पर रखे गए नियम आदि में संशोधन,

लोक सभा नियम 235

11.7.1नियमों आदि से संबंधित अधिसूचना के सदन के पटल पर रखे जाने के बाद कोई भी सदस्य उनमें किए जाने वाले किसी संशोधन की सूचना दे सकता है।

11.7.2नियमों आदि में संशोधन की सूचना प्राप्त होने पर संसद एकक तत्काल उसे संबंधित विभागों में संसद अनुभाग के प्रभारी संयुक्त सचिव के ध्यान में लाएगा, जो:

(क) तत्काल ही इसको मंत्री को इस संबंध में आदेश प्राप्त करने के लिए प्रस्त्‌ुत करेगा कि संसद द्वारा संशोधन के लिए निर्धारित सांविधिक अवधि के समाप्त होने से पहले ही संसद मंे चर्चा करने की व्यवस्था की जाए;

(ख) चर्चा के लिए निर्धारित की जाने वाली तारीख संसदीय कार्य मंत्रालय से विचार-विमर्श करके तय करेगा; और

(ग) चर्चा के दौरान मंत्री के प्रयोग के लिए इसका एक संक्षिप्त ब्यौरा तैयार करेगा।

11.7.3यदि किसी नियमों आदि में संशोधन करने से संबंधित प्रस्ताव किसी सदन में स्वीकार कर लिया जाता है तो उसे लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय दूसरे सदन में भेज देगा। यदि इसको दूसरे सदन में भी स्वीकार कर लिया जाता है, तो संबंधित विभाग पैरा 11.5.1 के अनुसार नियमों आदि को संशोधित करके उन्हें राजपत्र में अधिसूचित करने तथा उनको प्रत्येक सदन के पटल पर रखने की कार्रवाई करेगा।

11.7.4(i)यदि मूल अधिनियम में यह उपबंध है कि उसके अंतर्गत बनाए नियम आदि संसद के अनुमोदन के बाद लागू होंगे तो संबंधित विभाग निर्धारित फार्म में (अनुबंध-22) एक प्रस्ताव संसदीय कार्य मंत्रालय को सूचित करते हुए महासचिव, लोक सभा/राज्य सभा को भेजेगा। इस प्रकार के प्रस्ताव पर चर्चा की तारीख संबंधित विभाग से परामर्श करके संसदीय कार्य मंत्रालय द्वारा निश्चित की जाएगी। ऐसे मामले में मंत्री के प्रयोग के लिए इसका एक संक्षिप्त ब्यौरा भी तैयार किया जाएगा।

नियमों को पूर्व-व्यापी प्रभाव देना

(ii)ऐसे मामलों में जिनमें मूल अधिनियम में पूर्व-व्यापी प्रभाव देने का उपबंध हो तो उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों के साथ एक व्याख्यात्मक टिप्पणी दी जानी चाहिए जिसमे ऐसे पूर्व व्यापी प्रभाव देने की आवश्यकता के कारण और परिस्थितियां दी गई हों। उस टिप्पणी में यह भी बताया जाना चाहिए कि पूर्व व्यापी प्रभाव देने से किसी पर भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। उन मामलों में जहां मूल अधिनियम में पूर्व व्यापी प्रभाव देने का उपबंध नहीं किया गया हो लेकिन अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण पूर्व व्यापी प्रभाव देने का प्रस्ताव किया गया हो उस प्रयोजन से कानूनी मंजूरी के लिए पूर्व कार्रवाई कर लेनी चाहिए।

संसदीय कार्य मंत्रालय का तारीख 22.9. 1973 का का.ळ्ाा. सं.32 (57)/73-आर.एण्ड सी.

11.7.5नियमों और विनियमों में किए जाने वाले सभी संशोधन सरकारी राजपत्र में प्रकाशित किए जाएंगे। यदि एक जैसे नियमों अथवा विनियमों में दो या दो से अधिक संशोधन, राजपत्र के एक ही संस्करण में प्रकाशित किए जाने हैं तो उन्हें उपर्युक्त नियमों आदि के संशोधनों में दिए गए अनुसार ही क्रम संख्याएं दी जाएंगी और उनका प्रकाशन भी उसी क्रमानुसार किया जाएगा।

अधीनस्थ विधान संबंधी समिति

लोक सभा नियम 320

राज्य सभा नियम 209

11.8अध्यक्ष/सभापति द्वारा गठित अधीनस्थ विधि निर्माण संबंधी समितियां संबंधित सदन के पटल पर रखे गए सभी नियमों आदि की संवीक्षा करती हैं। इस समिति की सिफारिशों से संबंधित रिपोर्ट समिति अध्यक्ष द्वारा सदन में प्रस्तुत की जाती हैं।

समिति की रिपोर्ट पर की गई कार्रवाई

11.9.1(i)समिति द्वारा रिपोर्ट प्रस्तुत करने के तुरंत बाद:

(क) संसदीय कार्य मंत्रालय, समिति द्वारा की गई ऐसी सिफारिशों पर, जो सामान्य प्रकार की हैं और जिनका संबंध एक से अधिक विभाग से है, कार्रवाई करेगा।

(ख) संबंधित विभाग उन सिफारिशों पर, जो मूल रूप से उनसे संबंधित हैं - तुरंत कार्रवाई करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि च्की गई कार्रवाई के विवरण, रिपोर्ट प्रस्तुत करने की तारीख से छ: मास की अवधि के भीतर संसदीय कार्य मंत्रालय को सूचित करते हुए यथास्थिति लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय को सीधे भेज दिए जाते हैं।

(ii) यदि संबंधित विभाग कोई सिफारिश स्वीकार कर लेता है तो वह उस स्वीकृति की सूचना लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय को भेजेगा और संसदीय कार्य मंत्रालय को भी इसकी सूचना देगा। फिर भी जहां संबंधित विभाग को ये सिफारिशें स्वीकार्य न हों अथवा विभाग को उन्हें लागू करने में कठिनाई हो तो वह:-

(क) इसे स्वीकार न किए जाने के कारणों का संक्षिप्त ब्यौरा मंत्री को प्रस्तुत करेगा; तथा

(ख) उसका अनुमोदन प्राप्त करने के बाद, विभाग की टिप्पणियां यथास्थिति लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय को भेज देगा तथा संसदीय कार्य मंत्रालय को इसके संबंध में सूचना देगा।

11.9.2यदि अधीनस्थ विधि निर्माण संबंधी समिति की सिफारिशों के आधार पर नियम में संशोधन किया जाना हो तो विभाग (पैरा 11.4 और 11.5.1 के अनुसार) नियमों में संशोधन करने, संशोधित नियमों आदि को राजपत्र में अधिसूचित कराने तथा उन्हें प्रत्येक सदन के पटल पर रखने के लिए कार्रवाई करेगा।

11.10अधिनियम के लागू होते ही नियम, विनियम, उपविधि, आदेश आदि बनाने को प्राधिकृत करने वाली उन विशिष्ट धाराओं का पता लागाने के लिए उसकी जांच की जानी चाहिए।

11.11प्रत्येक विभाग में संबंधित अनुभाग द्वारा एक रजिस्टर रखा जाए जिसमें विधान संबंधी प्रक्रिया के विभिन्न चरणों का उल्लेख हो अर्थात् अधिनियम का नाम, उसके लागू होने की तारीख, सरकार को विधायी शक्तियां प्रदान करने वाली धाराएं (उप-धाराओं आदि सहित); क्या नियम बनाने का अधिकार सरकार के अतिरिक्त किसी अन्य एजंेसी को दिया गया है तथा नियमों, पर कार्रवाई करने के विभिन्न चरणों का बताया जाना अर्थात् प्रारूप नियम तैयार करना, यदि आवश्यक हो तो उनको राजपत्र में अधिसूचित करना, आपत्तियों और सुळाावों पर विचार करना, विधि और न्याय मंत्रालय के परामर्श से नियमों को अंतिम रूप प्रदान करना, उनका अनुवाद कराकर राजपत्र में अंतिम रूप में अधिसूचित करना। उपर्युक्त रजिस्टर को संबंधित अनुभाग द्वारा प्रभारी अधिकारी को आवधिक जांच के लिए प्रस्तुत किया जाए कि क्या किसी कारण से विधान प्रक्रिया में किसी भी चरण पर रूकावट तो नहीं आई है।

11.12अनुभाग प्रभारी द्वारा मासिक विवरणी इस कार्य के समन्वय के लिए तैनात संयुक्त सचिव को नियमित रूप से प्रस्तुत की जाएगी जो कि प्रगति का मानीटर करेंगे और इस मामले में किसी प्रकार के विलंब से बचने के लिए उपचारात्मक उपाय करेंगे। साथ ही कई उपचारात्मक कार्रवाई सहित इस रिपोर्ट को आगे अपर सचिव/सचिव को प्रस्तुत करेंगे।

11.13जिन मामलों में कानून के अधीन नियम/विनियम छ: मास की अवधि के भीतर अधिसूचित नहीं किए गए, उनकी एक तिमाही रिपोर्ट विधि और न्याय मंत्रालय के विधायी विभाग को नियमित रूप से भेजी जाए।

11­.14विभाग अधिनियमों और उसके अधीन बनाए गए नियमों तथा विनियमों, उपविधियों आदि की समुचित संख्या में अद्यतन प्रतियों को रखेगा। यदि संशोधन अधिक संख्या में हों, यथास्थिति अधिनियमों या नियमों, को पुन: छपवाने के प्रयत्न किए जाने चाहिए ताकि उनको सहज रूप में पढ़ा जा सके।

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