अध्याय - 15

नियम 377 के अधीन लोक सभा में उठाए गए मामले, नियम 180 क-ङ के अधीन तथा शून्य काल में राज्य सभा में उठाए गए मामले

नियम 377 के अधीन लोक सभा में उठाए गए मामले/राज्य सभा में विशेष उल्लेख के रूप में उठाए गए मामले

15.1लोक सभा के सदस्य यदि ऐसे किसी मामले को सदन की जानकारी में लाना चाहे जो व्यवस्था का प्रश्न न हो तो उन्हें अध्यक्ष, लोक सभा में प्रक्रिया तथा कार्य संचालन संबंधी नियमावली के नियम 377 के अधीन ऐसे मामलों को उठाने की अनुमति देता है। राज्य सभा में सभापति, राज्य सभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन संबंधी नियमावली के नियम 180 क-ड. के अधीन विशेष उल्लेख के रूप में अन्य अत्यावश्यक सार्वजनिक महत्व के मामलों को उठाने की अनुमति देते हैं। ये मामले सामान्यत: प्रश्नों और ध्यानाकर्षण नोटिस निपटाने के बाद उठाए जाते हैं।

उठाए गए मामलों के उत्तर

15.2लोक सभा तथा राज्य सभा में उठाए गए मामलों के आवश्यक सार अगले दिन लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय द्वारा किसी विशिष्ट दिन संबंधित विभागों को भेज दिए जाते हैं। इन सारों की प्रतियां संसदीय कार्य मंत्रालय को भी पृष्ठांकित की जाती हैं। प्रत्येक प्रशासनिक विभाग को यथाशीघ्र एक महीने के भीतर संसद के संबंधित सदस्य (सदस्यों) को उनके मंत्री/राज्य मंत्री के माध्यम से जवाब भेजना होता है। चूंकि विभिन्न एजेंसियों तथा राज्य सरकारों से सूचना इकट्ठी की जानी होती है अत: किसी प्रकार के विलंब की प्रत्याशा होने पर संबंधित संसद सदस्य को अंतरिम जवाब भेजा जाना चाहिए। सदस्यों को भेजी गई सूचनाओं की प्रतियां लोक सभा/राज्य सभा सचिवालय तथा संसदीय कार्य मंत्रालय को निश्चित रूप से पृष्ठांकित की जाएं ताकि उन मामलों को लंबित मामलों के रजिस्टर से काट दिया जाए।

मामलों का अंतरण

15.3यदि विभाग को यह पता चलता है कि मामला किसी अन्य विभाग से संबंधित है तो वह विभाग उस विभाग को मामले के अंतरण को स्वीकार करने के लिए अनुरोध कर सकता है और उस विभाग के अंतरण को स्वीकार करने पर इसकी सूचना संसदीय कार्य मंत्रालय और संबंधित संसद सचिवालय को दी जाए। अंतरिती विभाग द्वारा जब तक यह सूचना प्राप्त हो तब तक वह मामला उस विभाग के नाम में लंबित दर्शाया जाता रहेगा जिसे मूल रूप से उसे भेजा गया था। इस विषय पर मतभेद होने की स्थिति में कि कौन सा विभाग उस मामले पर कार्रवाई करेगा, मंत्रिमंडल सचिवालय के तारीख 25 अप्रैल, 1995 के अर्ध शासकीय पत्र 73/2/15/85-स्था. में दी गई प्रक्रिया का अनुपालन किया जाएगा।

सदस्यों की सेवानिवृत्ति/ त्यागपत्र आदि का प्रभाव

15.4लोक सभा में नियम 377 के अधीन उठाए गए मामलों के बारे में यदि मामले को उठाने वाला कोई सदस्य सदन में अपनी सदस्यता (सीट) से त्यागपत्र दे देता है या उसकी मृत्यु हो जाती है तो संबंधित विभाग द्वारा उस मामले का उत्तर वास्तविक स्थिति का उल्लेख करते हुए लोक सभा सचिवालय को भेज दिया जाएगा तथा उसकी सूचना संसदीय कार्य मंत्रालय को भेजी जानी चाहिए। राज्य सभा में विशेष उल्लेख के तहत उठाए गए मामलों के बारे में यदि मामले को उठाने वाला सदस्य सेवानिवृत्त हो जाता है या सदन में अपनी सदस्यता (सीट) से त्यागपत्र देता है अथवा उसकी मृत्यु हो जाती है तो राज्य सभा सचिवालय और संसदीय कार्य मंत्रालय को कोई उत्तर भेजने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन यदि सदस्य, जिसने लोक सभा/राज्य सभा की अपनी सदस्यता से त्यागपत्र दिया था अथवा राज्य सभा से सेवानिवृत्त हुआ था पुन: उसी सदन के लिए निर्वाचित होता है जिस सदन से उसने त्यागपत्र दिया था अथवा जिस सदन से वह सेवानिवृत्त हुआ था तो संबंधित संसद सचिवालय और संसदीय कार्य मंत्रालय को सूचित करते हुए सदस्य को उत्तर भेजा जाएगा।

लोक सभा भंग होने का प्रभाव

15.5लोक सभा के भंग होने पर उस लोक सभा की अवधि के दौरान नियम 377 के अधीन उठाए गए मामले व्यपगत हो जाएंगे।

उठाए गए मामलों के रजिस्टर

15.6उठाए गए प्रत्येक मामले का विवरण संसद एककों द्वारा अनुबंध 25 में दिए गए उनके रजिस्टरों में दर्ज किया जाना चाहिए। जिसके बाद मामला संबंधित अनुभाग को भेज दिया जाएगा। संसद एकक दो रजिस्टर रखेगा - एक नियम 377 के अधीन लोक सभा में उठाए गए मामलों के लिए और दूसरा राज्य सभा में उठाए गए विशेष उल्लेख वाले मामलों के लिए।

15.7संबंधित अनुभाग भी अनुबंध 26 में दिए अनुसार रजिस्टर रखेगा। लोक सभा तथा राज्य सभा में उठाए गए मामलों के संबंध में अलग-अलग रजिस्टर रखे जाएंगे जिनमें सत्रवार प्रविष्टियां की जाएंगी।

अनुभाग अधिकारी तथा शाखा अधिकारी की भूमिका

15.8संबंधित अनुभाग का अनुभाग प्रभारी अधिकारी-

(क) सप्ताह में एक बार रजिस्टरों की संवीक्षा करेगा।

(ख) यह सुनिश्चित करेगा कि जो भी आवश्यक अनुवर्ती कार्रवाई की जानी चाहिए वह अविलंब की जाए, तथा

(ग) हर पखवाड़े मंे रजिस्टर शाखा अधिकारी को प्रस्तुत करेगा जो वरिष्ठ अधिकारियों का ऐसे मामलों की ओर ध्यान आकर्षित करेगा जिनके जवाब दिए जाने अभी बाकी हैं।

प्रश्नकाल के बाद (शून्य काल में) अति आवश्यक सार्वजनिक महत्व के मामले

15.9पीठासीन अधिकारी (लोक सभा के अध्यक्ष और राज्य सभा के सभापति) सदस्यों को प्रश्नकाल के बाद अर्थात् च्शून्य काल के दौरान दोनों सदनों में अति आवश्यक सार्वजनिक महत्व के मामलों को उठाने की अनुमति देते हैं। जब कभी पीठासीन अधिकारी दोनों सदनों में च्शून्य काल के दौरान उठाए गए कुछ मामलों पर सरकार या संसदीय कार्य मंत्रालय के मंत्री/राज्य मंत्री को आश्‍वासन देने के लिए निदेश देते हैं तो उक्त मामलों से संबंधित सदन की कार्यवाहियों में से संगत उद्धरण संसदीय कार्य मंत्री द्वारा उसी दिन संबंधित मंत्री को उस कार्रवाई के लिए भेजे जाते हैं जिसे विभाग द्वारा आवश्यक समळाा जाए। संसदीय कार्य मंत्रालय दोनों सदनों में शून्य काल के दौरान उठाए गए ऐसे मामलों से संबंधित कार्यवाहियों में से संगत उद्धरण भी संबंधित विभाग को सूचना और ऐसी कार्रवाई जिसे वह आवश्यक समळो, के लिए भेजता है, जिन मामलों में कोई निदेश या आश्‍वासन नहीं दिया गया है। विभाग ऐसे मामलों की जांच कर सकता है, और यदि आवश्यक हो तो, संसदीय कार्य मंत्रालय को सूचित करते हुए सदस्यों को उत्तर भेज सकता है।

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